सोमवार, 22 नवंबर 2010

जागरण का फोटोग्राफर चोर है!

अब तक इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में विजुअल चुराने या प्रिंट मीडिया में खबरें चुराने या नकल करने की बातें सामने आती थीं. पर इस बार मामला बिल्‍कुल जुदा है. इस बार एक अखबार के फोटोग्राफर ने दूसरे अखबार के फोटोग्राफर पर उसकी द्वारा खिंची गई फोटो को चुराकर अपने नाम से छपवाने का आरोप लगाया है.

हिन्‍दुस्‍तान, शाहजहांपुर के फोटोग्राफर प्रमोद पांडेय ने दैनिक जागरण के फोटोग्राफर राजेश्‍ा राठौर पर अपनी फोटो चोरी करने का आरोप लगाया है. इसकी शिकायत उन्‍होंने जागरण, शाहजहांपुर के ब्‍यूरोचीफ रमेश राय से करने की बात भी कही है. प्रमोद का कहना है कि रमेश राय ने इस संबंध में उचित कार्रवाई करने का आश्‍वासन दिया है. प्रमोद का कहना है कि 20 नवम्‍बर को जागरण के पेज नम्‍बर तीन पर जो फोटो छपी है, वह उन्‍होंने खिंची थी. उनके द्वारा ली गई फोटो को राजेश ने हार्डडिस्‍क से चुरा लिया तथा बाईलाइन अपने यहां प्रकाशित करा दिया. यह फोटो कोडक जेड 612 माडल कैमरे से ली गई है.

प्रमोद का कहना है कि यह कैमरा शाहजहांपुर में सिर्फ उनके पास ही है. इस फोटो की जांच कराई जा सकती है. उन्‍होंने अपने सच के समर्थन में ओरिजनल फोटो भी भेजा है. नीचे उनके द्वारा भेजा गया ओरिजनल फोटो तथा दैनिक जागरण में प्रकाशित फोटो दिया जा रहा है.

हिन्‍दुस्‍तान

कौन सही? हिन्‍दुस्‍तान या अमर उजाला!

देहरादून। हिन्दुस्तान और अमर उजाला के देहरादून संस्करण में 20 नवंबर 2010 को एक खबर प्रकाशित हुई है। ये खबर अजमेर ब्लास्ट के आरोपी स्वामी असीमानंद की गिरफ्तारी का है। लेकिन दोनों ही अखबारों ने अपनी-अपनी खबरों में स्वामी असीमानंद के बारे में अलग-अलग सूचनाएं दी है। अमर उजाला ने फ्रंट पेज पर असीमानंद के गिरफ्तारी की खबर देने के बाद अखबार के 9वें पेज पर ‘‘कई संतों का नजदीकी है असीमा नंद’’ के शीर्षक से एक फॉलोअप लगाया है। जिसमें उसने असीमानंद को पश्चिम बंगाल का मूल निवासी बताते हुए उनका नाम लव कुमार सरकार बताया है।

दूसरी तरफ हिन्दुस्तान ने इसी खबर को सेकेंड लीड बनाते हुए ‘‘हैदराबाद विस्फोट में असीमानंद गिरफ्तार’’ नामक शीर्षक से खबर छापी है और बताया है कि स्वामी असीमानंद उर्फ ओंकारानंद का असली नाम जतिन चटर्जी है और वह मूलतः पंश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं। लेकिन यहीं हिन्दुस्तान अखबार इसी संस्करण के पेज नंबर 10 पर असीमानंद के नाम को दो बार नसीमानंद लिखा है।

अब अगर इन दोनों अखबारों ने असीमानंद के मूल निवास का आधार उनसे बरामद किसी पासपोर्ट को माना है तो उस पर तो एक ही नाम लिखा होगा। या तो उस पर लवकुमार सरकार लिखा होगा या फिर जतिन चटर्जी। यदि यह सही है तो फिर किसी एक अखबार की सूचना गलत है। अब अगर गलत सूचना देने वाला अखबार कहे कि खबर को जल्दी भेजने के चक्कर में गलत जानकारी गई तो यह असत्य होगा क्योंकि ये गिरफ्तारी शुक्रवार की अलसुबह हुई है और अखबार में खबर छपी है शनिवार को।

तो ये माना जा सकता है। संबंधित संवाददाता के पास इसकी छानबीन करने का पर्याप्त समय था। लेकिन उसने भी घर बैठे पुलिस वालों से जानकारी ली और जो भी गलत जानकारी मिली उसे खबर बना दिया। खैर मेरा उद्देश्य किसी भी अखबार की आलोचना करना नहीं है।

मैं बस इतना चाहता हूं कि ये दोनों ही अखबार अति लोकप्रिय अखबार है और दोनों की अलग अलग जानकारी से लोगों में भ्रम फैलता है, जो पत्रकारिता और आम पाठक के लिए भी हानिकारक है। अतः इन दोनों ही पत्रों से अनुरोध है कि किसी भी तरह की जानकारी को पर्याप्त चेकआउट करने के बाद ही प्रसारित करे तो बेहतर होगा।


चौथी दुनिया का यूपी-उत्‍तराखंड संस्‍करण शुरू

राष्ट्रीय साप्ताहिक समाचार पत्र चौथी दुनिया के उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड संस्करण का प्रकाशन शुरू हो गया. आकर्षक साज-सज्जा और बेहतरीन खबरों के संग बड़ी सादगी के साथ चौथी दुनिया का उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड संस्करण प्रस्तुत किया गया. इस अंक के राष्ट्रीय कवर पर प्रभात रंजन दीन की ब्रेकिंग स्टोरी है. इस कवर स्टोरी के जरिए प्रभात रंजन दीन ने मुंबई के आदर्श सोसाइटी घोटाले के लखनऊ लिंक और सेना के मध्य कमान मुख्यालय में हो रहे उससे बड़े घोटाले का खुलासा किया है.

उल्लेखनीय है कि दिल्ली में चौथी दुनिया के एडिटर (इन्वेस्टिगेशन) प्रभात रंजन दीन ही उत्तर चौथी दुनियाप्रदेश/उत्तराखंड संस्करण देख रहे हैं. इस संस्करण की शुरुआत आठ पृष्ठों के खूबसूरत संयोजन के साथ की गई है, जिसमें शुभकामना विज्ञापनों की भरमार है. इन विज्ञापनों में बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान, राजनीतिक दल, शिक्षण संस्थान व सामाजिक व्यक्तित्व शामिल हैं.

16 पृष्ठों के राष्ट्रीय एडिशन के साथ चार पृष्ठों का यूपी/उत्तराखंड संस्करण समायोजित रहेगा. यानी 20 पृष्ठों का यह साप्ताहिक समाचार पत्र पाठकों तक मात्र पांच रुपए में पहुंचा करेगा. हालांकि चौथी दुनिया के यूपी/उत्तराखंड संस्करण की शुरुआत आठ पृष्ठों, यानी कुल 24 पृष्ठों के साथ की गई है. यूपी/उत्तराखंड संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय का छोटा विशेष संपादकीय भी है, जिसमें उन्होंने बड़ी सादगी और विनम्रता से पत्रकारीय दायित्वों के निर्वहन का पाठकों को आत्मीय भरोसा दिलाया है.

यूपी/उत्तराखंड संस्करण में लखनऊ के प्रतिष्ठित कवि व्यंग्यकार सर्वेश अस्थाना ने लखनऊ के बदलते संस्कार और संस्कृति पर अपने चुटीले अंदाज में एक रोचक लेख लिखा है. मेग्‍सेसे पुरस्कार विजेता संदीप पांडेय ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की कार्यसंस्कृति को व्यापक नजरिए से देखते हुए उस पर एक विचारोत्तेजक लेख लिखा है. इनके अलावा देहरादून की पत्रकार पूजा यादव ने उत्तराखंड में ऊर्जा (बिजली) की स्थिति की समीक्षा की है. चौथी दुनिया का यूपी/उत्तराखंड संस्करण आज लखनऊ और देहरादून की प्रमुख हस्तियों के हाथों तक पहुंचा. जिसे लोगों ने खूब सराहा. प्रेस विज्ञप्ति


यही है पत्रकारिता का असली चेहरा!

हिंदी पत्रकारिता में शोषण अपने चरम पर है. पत्रकारों में कम पैसे पाने का तो अवसाद है ही, साथ में नौकरी जाने की असुरक्षा और प्रोमोशन पाने की इतनी प्रतिद्वंदता है कि कोई किसी की हत्या तक करवा सकता है. ऐसे माहौल में कई पत्रकार घनघोर मानसिक अवसाद के शिकार हैं. यह राष्ट्रव्यापी हिंदी पत्रकारिता की समस्या है. इस समस्या का समाधान कई पत्रकारों को माओवाद में नज़र आ रहा है. बातों-बातों में ऐसे शोषित पत्रकार माओवाद का सहारा लेकर इस पूंजीवादी शोषक मीडिया को खत्म करने की वकालत करते हैं. पत्रकारों का माओवाद समर्थक होना स्वाभाविक है क्योंकि मीडिया में हो रहे शोषण की तरफ से सरकार आँख मूंदे हुए है. लगभग सभी अखबार सरकारी विज्ञापन पाने के लिए सरकार की चमचागिरी में लगे हैं. सरकार की वाहवाही में जुटी हिंदी मीडिया पत्रकारों की उस पीढ़ी को पुरस्कार दे रही है, जो पेड न्यूज जुटाने में माहिर है. जन सरोकार से जुड़ी खबर लेने वाले पत्रकारों को बदले में फटकार और गाली मिलती है और अगर वो नहीं सुधरे तो नौकरी से छुट्टी. ऐसे में कोई ईमानदार पत्रकार माओवादी बन जाय तो इसमें इस सामजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का दोष है, जो व्यक्ति को अपराधी बनने पर मजबूर कर रहा है.

सबसे बड़ा अपराधी राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमे ऐसे नेता और प्रशासक राजकाज चला रहे हैं, जिनका पेशा ही है योजनाओं का धन लूटना. पूरे देश में कही भी कोई भी योजना लागू होती है तो हर किसी को पता रहता है कि घोटाला तो होना ही है. धन की ऐसी लालची राजनीतिक व्यवस्था स्वाभाविक तौर से एक शोषक और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के हाथों बिकी हुई है, जिसमें सत्ता का असली बागडोर उन अति मुनाफाखोर व्यवसाइयों के हाथ में है, जो सरकारी तंत्र के हर पुर्जे को अपने तरीके से चलाने की ताकत रखती है. ऐसे में अगर जनसरोकारों की बात कोई पत्रकार करता है तो उसे सूली पर चढ़ाने की तैयारी शुरू हो जाती है.

पत्रकारों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार उनके अंदर रोष भर रहा है. इस रोष को निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा. माओवादी शक्तियां इस रोष को अपने पक्ष में उपयोग करने की साजिश में जुटी हुई है. प्रत्यक्ष तौर पर कई मानववादी और समाजसेवी माओवाद विचारधारा के प्रति आये दिन मीडिया में अपना समर्थन जाहिर करते हैं. अगर सरकार ही शोषण को बढ़ावा देने लगे तो माओवादी शक्तियों का इस देश में एक समाधान के रूप में उभरना भी उतना ही स्वाभाविक है.

माओवाद के समर्थन में बोलने वाले अधिकांश पत्रकार वैसे ही मानववादी पत्रकार हैं, जो दूसरे क्षेत्र की जमी जमाई नौकरी या पेशा छोड़कर इस क्षेत्र में इसलिये आये थे ताकि वो देश और समाज सुधारने में अपना योगदान दे सकें. लेकिन यथार्थ परिस्थिति उनकी हत्या करने पर तुली है. पत्रकारों में जमा हो रहे इस अवसाद उसे किधर ले जायेगा ये कहना कठिन है, लेकिन ऐसे शोषित पत्रकारों का मानसपटल माओवादी विचार बीज के लिए उपजाऊ भूमि की तरह है, इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए.

लेखक राजीव सिंह युवा पत्रकार हैं. फिलहाल पत्रकारिता के अंदर-बाहर की दुनिया को समझने की कोशिश कर रहे हैं

वसूली करते तीन फर्जी पत्रकार पकड़ाये

कुशीनगर के पटहेरवां थाना क्षेत्र के ग्राम इन्दिरा बाजार में एक पेटी डीलर को धमका कर रुपये वसूल रहे तीन फर्जी पत्रकारों को ग्रामीणों ने पकड़ लिया. पहले तीनों की जमकर धुनाई की. इसके बाद पुलिस के हवाले कर दिया. खुद को पत्रकार बताने वाले तीनों युवकों पर आरोप है कि इन्‍होंने पेटी डीलर से तीन किस्‍तों में 80 हजार रूपये वसूल किया है.

जानकारी के मुताबिक इन्दिरा बाजार चौराहे पर भानपुर निवासी आबिद खां डीजल बेचने का धंधा करते हैं. कुछ दिन पहले इनकी दुकान पर तीन युवक पहुंचे. तीनों ने खुद को अखबार और न्यूज चैनल का पत्रकार बताकर रोब गालिब किया. इन्‍होंने आबिद को अर्दब में लेने के लिए उस पर गलत तरीके से धंधा करने का आरोप लगाया. इसके बाद खबर छापने की धमकी देकर आबिद से रुपये की मांग की. व्यवसायी ने इन्‍हें किश्तों में पैसे देने की हामी भरी. इसके बाद तीन किश्तों में कथित पत्रकारों ने उससे 80 हजार रुपये वसूला.

चौथी किश्त लेने ये कथित पत्रकार इंदिरा बाजार पहुंच गए. आबिद से बीस हजार रुपये की मांग की तथा नहीं देने पर खबर छापने की धमकी दी. कारोबारी ने इस बार शोर मचा दिया. शोर सुनकर कई ग्रामीण वहां पहुंच गए. वसूली करने पर अमादा तीनों कथित पत्रकारों को पकड़ लिया. इसके बाद ग्रामीणों ने तीनों की जमकर खबर ली. लात-घूंसों से पिटाई की. इसकी खबर एसपी को दी गई. एसपी के निर्देश्‍ा पर सीओ व एसओ मौके पर पहुंचे तथा कथित पत्रकारों को हिरासत में ले लिया. इनके पास से बिना नम्‍बर की एक मारुति कार बरामद हुई.

थानाध्‍यक्ष पटहेरवां लल्‍लू राम ने बताया कि पकड़े गए तीनों युवकों की शिनाख्‍त राजहंस वर्मा कथित पत्रकार गोरखनाथ टाइम्स, अजय कुमार गुप्ता कथित संवाददाता अब तक टीवी व अरूण चतुर्वेदी कथित पत्रकार न्यूज चैनल सुदर्शन के रूप में हुई है.


संपादक पद से हटाए गए प्रकाश दुबे

भोपाल के मणिकांत सोनी ने संभाली भास्कर, नागपुर के संपादक पद की जिम्मेदारी : समाचार लिखने के प्राइम टाइम में अपने केबिन में बुलाकर रिपोर्टर्स और सब एडिटर्स के चेहरे की रंगत उड़ाने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रकार शंकर दुबे की बुधवार को चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी. जैसे ही दैनिक भास्कर नागपुर के विशंभर भवन के कान्फ्रेंस सभागृह में बुधवार की शाम बैठक में प्रकाश दुबे ने यह घोषणा की कि अब नागपुर संस्करण के संपादक के रूप में मणिकांत सोनी सेवा देंगे, सभी के चहरे सन्न हो गये. दुबे के पाले के पत्रकारों को तो जैसे सांप सूंघ गया. दुबे पीड़ित पत्रकारों के मन में खुशी की लहरें हिड़ोले मारने लगी. करीब दस मिनट में यह समाचार चारों ओर सनसनी की तरह फैल गई.

सूत्रों का कहना है कि दैनिक भास्कर का नागपुर प्रबंधन दुबे को किनारा करना चाह रहा था. इसके लिए पिछले कुछ महीने से प्रबंधन किसी ने किसी तरह से दुबे की उपेक्षा कर रहा था, जिससे कि वे स्वयं संस्थान छोड़ कर चले जाएं. लेकिन दुबे ने प्रबंधन की हर उपेक्षा सह ली. हालांकि नागपुर भास्कर में किसी को निकालने की परंपरा नहीं रही है इसलिए प्रबंधन ने प्रकाश दुबे से ही बैठक में मणिकांत सोनी को नये संपादक होने की घोषणा कराई. मणिकांत सोनी इससे पहले भास्कर के ही भोपाल संस्करण में समाचार संपादक के रूप में कार्यरत थे. इस घोषणा के बाद भास्कर के प्रधान संपादक मनमोहन अग्रवाल ने उपस्थित भास्करकर्मियों से कहा कि वे इस बदलाव को नकारात्मक रूप में न लें. दुबेजी को दूसरी जिम्मेदारी दी जाएगी. अब दुबेजी भास्कर के महाराष्ट्र के दूसरे संस्करणों को देखेंगे, लेकिन नागपुर में पेज 1 से 20 तक की पूरी जिम्मेदारी नये संपादक मणिकांत सोनी पर होगी.

एक चर्चा यह भी है कि दुबेजी को ग्रुप एडिटर बनाया गया है लेकिन उन्हें उनके केबिन से जाने को कह दिया गया है और उसमें मणिकांत सोनी बैठेंगे. दुबेजी को उपर एक कमरे में बैठने को कहा गया है. प्रबंधन सूत्रों का कहना है कि वर्षों तक सेवा करने के कारण ही दुबे को सम्मान में उन्हें महाराष्ट्र के संस्कारणों के समूह संपादक के रूप में कार्य करने के लिए कहा गया है. वे संपादकीय मामलों में सलाह का काम करेंगे. लेकिन नागपुर के संपादकीय मामलों में हस्तक्षेप का अधिकार दुबे को नहीं होगा. फिलहाल उनके लिए नागपुर स्थिति विशंभर भवन के तीसरे माले पर एक केबिन की व्यवस्था की जा रही है. इस माले पर मार्केटिंग, सर्कुलेशन, स्टोर और इवेंट विभाग का परिसर है.

एक पत्रकार साथी द्वारा भेजे गए मेल पर आधारित


गुरुवार, 11 नवंबर 2010

संकट में दैनिक भास्कर

शिमला मे दैनिक भास्कर को दो झटके लगे हैं. रमेश सिंगटा ने भास्कर छोड़ दिया है. वरिष्ट उप संपादक सुनील राणा दैनिक जागरण धर्मशाला के साथ हो लिए हैं. सुनील राणा के इस्तीफा देते ही शिमला भास्कर के सिटी पेज बनाने का संकट आ गया है. रिपोर्टिंग स्टाफ की हालत भी ठीक नहीं है. रमेश सिंगटा के जाने से रिपोर्टिंग स्टाफ का भी टोटा हो गया है. स्टेट ब्यूरो में अब दो लोग रह गए हैं. दैनिक भास्कर के शिमला संस्करण का हश्र भी गंगानगर भास्कर की तरह हो गया है. संपादक कीर्ति राणा की शिमला के स्टाफ से भी छतीस का आंकड़ा चल रहा है.
सूत्रों के अनुसार कीर्ति राणा का ऑफिस मे स्टाफ के साथ अजीब सा रवैया रहता है. इसी से रवैये खफा स्टाफ एक एक करके भास्कर का साथ छोड़ रहे हैं. गंगानगर से ट्रान्सफर होने के बाद कुछ समय तक कीर्ति राणा शिमला में शांत रहे. लेकिन दो महीनों से वो यकाएक एक्टिव हो गए हैं. सबसे पहले उन्होंने शिमला से एक फोटोग्राफर को धर्मशाला भेजा. उसके बाद उन्होंने अपने स्टाफ को इगनोर कर जागरण में कार्यरत एक व्यक्ति को चीफ सब एडिटर बना दिया. इससे ऑफिस का माहौल तनावपूर्ण हो गया. फिर शिमला, सोलन, मण्डी, काँगड़ा, ऊना, नाहन, कुल्लू और हमीरपुर के ब्यूरो चीफों को ट्रान्सफर करने की धमकी दी. मण्डी से राजेश कौशल और नाहन के ब्यूरो चीफ को हटा दिया, कीर्ति राणा से पहले मुकेश माथुर ने शिमला भास्कर को ठीकठाक ऊंचाई पर पहुंचाया था.

महान "पत्रकारों" के महान कारनामे

युनाइटेड भारत के दो पत्रकारों का कारनामा : अश्‍लील क्‍लीपिंग के बल पर शादी के बाद भी करते रहे शोषण : इलाहाबाद में पत्रकारिता को कलंकित करने वाला मामला सामने आया है. यह न केवल शर्मनाक है बल्कि मीडिया के चमकते स्‍क्रीन और सफेद पन्‍ने के पीछे का स्‍याह सच भी सामने लाया है. शहर के दो पत्रकारों ने एक नवोदित महिला पत्रकार को नौकरी दिलाने का झांसा दे कर न केवल उसके साथ नजदीकी संबंध बनाए बल्कि उसकी अश्लील क्लीपिंग भी तैयार कर ली.
इस क्‍लीपिंग के बल पर वो महिला पत्रकार को जबरदस्‍ती संबंध कायम रखने के लिए मजबूर भी करते रहे. इसकी जानकारी होने पर महिला पत्रकार के परिजनों ने डीआईजी से मामले की शिकायत की है. मामले की जांच शुरू कर दी गई है. जानकारी के मुताबिक इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार युनाइटेड भारत का पत्रकार राजीव चंदेल कटरा में किराए पर रहता था. वहां मकान मालिक की बेटी को उसने अपने रुतबे से प्रभावित कर लिया. राजीव ने उसे पत्रकार बनाने का सब्जबाग दिखाया तथा प्‍यार का नाटक करते हुए उसने नजदीकी रिश्ते बना लिए. काफी दिनों तक वह युवती को पत्रकार बनाने का झांसा देता रहा. इसके बाद उसने किसी तरह से युवती को अपने ही अखबार में संवाददाता की नौकरी दिलवा दी.
कुछ दिनों बाद जब युवती की शादी हो गई तो उसने अखबार की नौकरी छोड़ दी. विवाह के बाद भी राजीव युवती को अपने साथ संबंध रखने के लिए मजबूर करता रहा. इन दोनों के नजदीकी की खबर राजीव के सहयोगी और उसी के अखबार में काम करने वाले रिपोर्टर पंकज साहू को हो गई. पंकज ने भी युवती को डरा धमकाकर उसके साथ संबंध बनाने के लिए मजबूर किया. इसी बीच शातिर दिमाग पत्रकारों ने युवती के कोल्ड ड्रिंक में नशे की गोलियां मिलाकर उसे बेहोश कर दिया तथा उसकी अश्लील क्लीपिंग तैयार की. लगभग आठ मिनट की इस क्लीपिंग में युवती की आपत्तिजनक तस्वीरें खींची.
शादी के लगभग छह माह बाद युवती ने इच्छा जताई तो राजीव ने उसे दूसरे अखबार में नौकरी दिला दी. शादी के बाद सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था मगर युवती की क्लीपिंग बाजार में आ जाने से मामला बिगड़ गया. यह क्‍लीपिंग युवती के पति के रिश्तेदार के हाथ लगी तो उसने उसे युवती के पति को सौंप दिया. पति-पत्नी में कई दिनों तक तकरार हुई. बात मायके और ससुराल में फैल गई.
मायके के लोगों ने महिला पत्रकार से बात कर मामले की पूरी जानकारी हासिल की. इसके बाद वे सभी लोग अखबार के कार्यालय पहुंचे और जमकर हंगामा किया. दोनों पत्रकारों की धुनाई भी की गई. इसके बाद महिला पत्रकार के परिजन डीआईजी से मिले तथा उन्‍हें घटना से अवगत कराया। इसके बाद इस मामले की जांच सीओ तथा महिला थाने की एसओ को सौंपी गई है.

धन्य है युनाइटेड भारत की पत्रकारिता

युनाइटेड भारत के पिछले दिनों के अंक में एक खबर जान बूझकर नहीं छापी है. युनाइटेड कालेज ऑफ इंज‍ीनियरिंग एंड रिसर्च (UCER) के मैकेनिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के हेड ऑफ डिपार्टमेंट प्रोफेसर मनीष श्रीवास्‍तव की 24 सितम्‍बर की शाम कालेज से पढ़ाकर लौटते समय कालेज के बस से ही कुचल कर रास्‍ते में मौत हो गई. इलाहाबाद के लगभग सभी न्‍यूज पेपर ने दो या तीन कॉलम की स्‍टोरी फोटो के साथ लगाई है.
आप अमर उजाला, हिन्‍दुस्‍तान, दैनिक जागरण, आई-नेक्‍स्‍ट के इंटरनेट एडिशन देखकर कनफर्म कर सकते हैं. पर युनाइटेड भारत ने जिनका ये इंस्‍टीट्यूट है पूरी खबर दबा दी. कुछ नहीं छापा. क्‍या ये पत्रकारिता है. ये बात मन को बहुत कचोट रही है. सोचा आपसे शेयर कर लूं. हो सके तो भड़ास में इसे स्‍थान दे दीजिएगा.
और ये कोई पहली बार नहीं है, अभी करीब एक-दो महीने पहले युनाइटेड कालेज के स्‍टूडेंट्स द्वारा कालेज मैनेजमेंट की एट्रोसिटीज, जिसमें एक लड़के की मौत हो गई थी, के खिलाफ चार दिनों तक खूब जाम कर हंगामा हुआ. तोड़फोड़ हुई. कई सरकारी, गैर-सरकारी वाहनों को फूंक डाला गया. 15 दिनों तक कालेज बंद रहा. 12-15 स्‍टूडेंट्स सस्‍पेंड हुए. नेशनल लेवल की न्‍यूज बनी. टीवी न्‍यूज, पेपर रंग गए पर क्‍या मजाल की युनाइटेड भारत में एक लाइन लिखी गई हो. क्‍या ये पत्रकारिता है.